आदि भारत। गोंदिया महाराष्ट्र
भरत घासले
गोंदिया जिले की सालेकसा तहसील अंतर्गत मुंबई हावड़ा मार्ग पर स्थित दरेकसा रेलवे स्टेशन से 3 किलोमीटर दूर धनेगाव की घने जंगलों में स्थित गुफाएं पहाड़ों की हरियाली और प्राकृतिक खूबसूरती के बीच स्थित है. कचारगढ़ गुफा यह एशिया खंड के सबसे महाकाय प्राचीन प्राकृतिक गुफा है इस गुफा को आदिवासी गोंड समुदाय का उदगम स्थल कहा जाता है. लेकिन यह जगह आज भी गुमनामी से कोसों दूर है. प्रतिवर्ष माघ महीने की पूर्णिमा के दिन से आदिवासी समुदाय की आराध्य देवता महागोना कोयापूनम महापूजा का आयोजन बड़ी धूमधाम से किया जाता है.यहां देश की विभिन्न राज्यों के आदिवासी समाज एकत्रित होकर इस पांच दिवसीय राष्ट्रीय गोंडवाना महा अधिवेशन महोत्सव यात्रा में एकत्रित होकर इस श्रद्धा स्थल पर पहुंचते है. यह यात्रा 30 जनवरी से 3 फरवरी तक पांच दिवसीय कचारगढ यात्रा का आयोजन अनेक वर्षों से किया जा रहा है. जिसमें गोंडी धर्म, परंपरा,बोली, भाषा,पूजा विधि, नृत्य कला,रीति रिवाज व आदिवासी कला सांस्कृतिक महोत्सव देखने को मिलते हैं. मान्यता के अनुसार कचारगढ़ में आदिवासी गोंड समाज के कुल देवता का निवास है.प्रतिवर्ष माघ पूर्णिमा को देशभर में रहने वाले आदिवासी समाज अपने पूर्वजों को याद करने व गोंडी रचनाकार पारी कुपार लिंगो को याद करते हैं उनकी मान्यता है कि उनकी आत्मा यहां वास करती है यह गुफा लगभग 518 मीटर ऊंचाई पर स्थित है गुफा की ऊंचाई 94 मीटर व 25 मीटर गुफा का द्वार है.
*कुपार लिंगो ने इस स्थल से किया प्रचार शुरू*
गोंडी धर्म की स्थापना पारी कुपार लिंगो ने 5 हजार वर्ष पुर्व की थी. इस तरह की मान्यता है कि वह आदिवासी गोंड के धर्म गुरु पहाड़ी पारी कुपार लिंगो ने इस स्थल से धर्म का प्रचार प्रसार शुरू किया था इसलिए इस गुफा को पहादी परी कुपार लिंगो कचारगढ़ गुफा कहा जाता है. इसी गुफा में धर्मगुरु पारी कुपार लिंगो ने निवास कर 12 अनुयाई को वह 750 गोंड समाज की प्रचारको को धर्म की दीक्षा देकर प्रचार -प्रसार करने का मंत्र दिया.बाद में गोंड राजाओं में अपने छोटे-छोटे राज्यों की स्थापना कर राज्य पद्धति को चार विभागों में बांट लिया. जिसमें येरगुट्टाकोर, मोगुट्टाकोर, अफोका गट्टाकोर का समावेश है.
*1984 में पहली बार हुआ था माघ मेले का आयोजन*
आदिवासी समाज की पवित्र भूमि के रूप में प्रसिद्ध कचारगढ की खोज संबंधी रोम हर्षक इतिहास का कथन करने वाली किताब में सिद्ध किया है कि उल्लेखनीय है कि सन 1980 में के. बी मरसकोल्हे,आचार्य मोतीरावन कंगाली,सुमेंद्रसिंह ताराम, भरतलाल कोराम व शीतल मारकाम ने अपनी युवावस्था में धनेगाव आकर कचारगढ़ की खोज की थी जिसकी पहली यात्रा 1984 में शुरू की थी जो आज लाखों श्रद्धालु तक पहुंच गई है.